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‘बंटवारे’ का शिकार हुए कृषि विभाग को शिवराज सिंह चौहान से क्या उम्मीदें हैं?

हिंदुस्तान को आज़ादी मिले हुए तकरीबन 8 दशक होने को हैं. कृषि और खाद्य मंत्रालय के नाम पर नेहरू की कैबिनेट में केवल एक मंत्री हुआ करते थे. डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद. बाद में वह आज़ाद हिंदुस्तान के पहले राष

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Rohit· Correspondent

27 जुलाई 2024· 5 min read

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‘बंटवारे’ का शिकार हुए कृषि विभाग को शिवराज सिंह चौहान से क्या उम्मीदें हैं?

‘बंटवारे’ का शिकार हुए कृषि विभाग को शिवराज सिंह चौहान से क्या उम्मीदें हैं?

हिंदुस्तान को आज़ादी मिले हुए तकरीबन 8 दशक होने को हैं. कृषि और खाद्य मंत्रालय के नाम पर नेहरू की कैबिनेट में केवल एक मंत्री हुआ करते थे. डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद. बाद में वह आज़ाद हिंदुस्तान के पहले राष्ट्रपति बने. बाद की सरकारों (लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी) में भी लगभग यही परिदृश्य रहा.
उस दौरान के कृषि मंत्री, विशेष रूप से सी. सुब्रमण्यम और जगजीवन राम राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से सक्षम मंत्री थे, जिनकी बातें तत्कालीन प्रधानमंत्री भी मानते थे. सुब्रमण्यम ने लाल बहादुर शास्त्री को उच्च उपज देने वाली मैक्सिकन गेहूं की किस्मों, सोनोरा 64 और लेर्मा रोजो 64 ए के 18,250 टन बीजों के आयात के लिए सहमत किया था, इसी फैसले ने हरित क्रांति की नींव रखी. उन्होंने ही कृषि मूल्य आयोग और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की स्थापना में भी भूमिका निभाई, जिसने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के निर्धारण और घोषित दरों पर फसलों की खरीद की राह आसान हुई. राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) भी सुब्रमण्यम के कारण ही अस्तित्व में आया था. उन्होंने नए संस्थान का मुख्यालय गुजरात के आणंद में खुलवाया क्योंकि उनका मानना था कि यह दिल्ली की आबो-हवा से दूर ही बेहतर काम करेगा.
ये सभी निर्णय प्रधानमंत्री आवास के हस्तक्षेप के बगैर दिल्ली के कृषि भवन में हो रहे थे और प्रधानमंत्रियों ने उनकी बात सुनी. उसी दौर का प्रसंग है कि जब इंदिरा गांधी ने 1974 में जगजीवन राम को दूसरी बार कृषि मंत्री बनने के लिए कहा तो वह कृषि विभाग से अलग हो चुके सिंचाई विभाग को भी अपने पास रखने पर अड़ गए और अंततः इंदिरा मान गईं.शायद वह समझती थीं कि कृषि विभाग सिंचाई के दम पर ही चल सकेगा.

ये भी पढ़ें -भारत में बढ़ा जंगलों का एरिया, चीन फिर भी कैसे आगे है?

वर्तमान पर सवाल क्यों?

इस वक्त जब कृषि मंत्रालय अपने अतीत से पूरी तरह अलग हो चुका है, खास कर एक मजबूत मंत्रालय से बिखर कर अलग अलग कई मंत्रालय बनने तक. ये विघटन या अलगाव 70 के दशक से शुरू हुआ था। सबसे पहले दिसंबर 1975 में उर्वरक मंत्रालय कृषि मंत्रालय से अलग हुआ। 1979 का अगस्त था जब ग्रामीण विकास मंत्रालय बना, उस वक्त इसे ग्रामीण पुनर्निर्माण मंत्रालय कहा जाता था, फिर 1980 में सिंचाई मंत्रालय अलग हुआ और फिर 1983 में खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय भी अलग कर दिए गए.
फिर कपड़ा मंत्रालय जिसके तहत कपास जो एक प्रमुख फसल है, उसके मामले चले गए, कृषि मंत्रालय और कमजोर हुआ. तंबाकू से जुड़े मामले भी वाणिज्य मंत्रालय के अधीन चले गए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में तो नहीं लेकिन दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही ये विघटन हुआ जब एक स्वतंत्र मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय अस्तित्व में आया, वहीं जुलाई 2021 में सहकारिता मंत्रालय बना दिया गया। ये वही मंत्रालय है जिसे खत्म करने की मांग को लेकर पिछले दिनों सैकड़ों किसान संगठनों ने पूरे देश में विपक्ष के नेताओं, सांसदों को मांग पत्र सौंपा था, वर्तमान में ये मंत्रालय मोदी कैबिनेट के सबसे मजबूत मंत्री और सरकार ने नंबर दो माने जाने वाले अमित शाह देख रहे हैं.

अलगाव से समस्या क्या?

जानकार ऐसा मानते हैं इन अलग-अलग विघटनों से कृषि मंत्रालय का वजूद सिमटता जा रहा है, और कई खेती और किसान उपयोगी फैसले मंत्रालय नहीं कर सकता है। कृषि मंत्रालय अब उर्वरक और सिंचाई संबंधित किसी बड़ी नीति का निर्माता नहीं बन सकता जबकि कृषि क्षेत्र इसके बगैर अधूरा है. खाद्यान्न और कपास की मार्केटिंग और खरीद एफसीआई और सीसीआई के पास है जो अन्य मंत्रालयों को रिपोर्ट करते है। सौभाग्य से, कृषि अनुसंधान और शिक्षा अभी भी इसका हिस्सा हैं लेकिन व्यावसायिक खेती और यहां तक जीएम फसलों के क्षेत्रीय परीक्षणों के लिए मंजूरी जीईएसी देती है क्योंकि उसमें पर्यावरण को होने वाले नुकसान भी एक फैक्टर है. जीईएसी वन और पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत है. सही होगा या गलत लेकिन पिछले सालों जीएम सरसों का मुद्दा मंत्रालय, जीईएसी आदि के बीच पैंडुलम बना रहा था।
एक अलग ग्रामीण विकास मंत्रालय के तर्क को कोई भी समझ सकता है क्योंकि कृषि ग्रामीण हो सकती है, लेकिन जो कुछ भी ग्रामीण है वह कृषि नहीं है. कृषि अंततः किसानों और उनकी उपज के बारे में है, जो सीधे खेतों से फसल के रूप में या पशुधन, जीवों को खिलाए जाने के बाद आती है. पशु पालन के भी जो प्रोडक्ट हैं वह फसल के ही बाइप्रोडक्ट हैं- चाहे वह मक्का, गेहूं का भूसा हो या चारा घास हो, फिर पशुपालन के भी प्रोडक्ट जैसे (गोबर) खेतों में खाद के काम आते हैं. एक्सपर्ट ऐसा मानते हैं कि अब ऐसे हालात में किसी भी नीति को बनाने से पहले उन्हें समग्र तौर पर देखने की जरूरत है बजाय अलग-अलग करके सोचने के. उन चीजों के लिए नीति निर्माण विभागीय बँटवारों के बीच में नहीं हो सकता जो एक दूसरे के पूरक हों.

फिर क्या हो मॉडल?

बहुतेरे कृषि मामलों के एक्सपर्ट्स इस बाबत अमेरिका के कृषि विभाग की व्यवस्था को ठीक मानते हैं जहां कृषि उत्पादन, भूमि संरक्षण, भोजन, पोषण, अनुसंधान, विपणन, विदेशी व्यापार और ग्रामीण विकास एक ही विभाग (कृषि सचिव) के अंतर्गत आते हैं. अमेरिका का ये मॉडल इसलिए भी उदाहरण है क्योंकि वहाँ का फसल उत्पादन, किसानों की स्थिति बाकी कई देशों के मुकाबले बेहतर है। भारत में एक अरसे बाद शिवराज सिंह चौहान के रूप में एक ऐसा कृषि मंत्री बनाया गया है, जिसके पास कृषि क्षेत्र में नीतिगत निर्णयों का अनुभव हो, बिल्कुल वैसे जैसे शरद पवार को एक बार माना जाता था। शिवराज सिंह को ग्रामीण मामलों की भी जानकारी है और क्लाइमेट चेंज से जुड़े खतरों को भी वो बराबर समझते हैं.

रिपोर्ट्स ऐसा कह रही हैं कि शिवराज भी कृषि क्षेत्र में बदलावों के लिए कमर कस चुके हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें सुब्रमण्यम, जगजीवन राम या शरद पवार बनने की जरूरत पड़ेगी जो फैसलों को लेकर अडिग और स्पष्ट रहे थे. और ऐसा तभी होगा जब ऐसा ऊपर से किया जाएगा जैसा शास्त्री और इंदिरा गांधी ने अपने मंत्रियों को राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से सशक्त कर के किया था.

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