लखनऊ (उत्तर प्रदेश) मानसून सीजन में 9 जुलाई तक उत्तर प्रदेश में सामान्य की तुलना में 37 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। बारिश को लेकर सबसे ज्यादा चिंता पूर्वी उत्तर प्रदेश को लेकर है, जहां सामान्य से 48 फीसदी कम बारिश हुई है, जबकि पश्चिमी यूपी में सामान्य से 13 फीसदी अधिक बारिश दर्ज की गई है।
प्रदेश के कई जिलों में सामान्य से कम वर्षा होने के कारण धान की रोपाई, खरीफ फसलों की बुवाई और खेतों में नमी बनाए रखना किसानों के सामने बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे समय में किसानों को वैज्ञानिक एवं मौसम आधारित सलाह उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद (UPCAR) ने 9 जुलाई 2026 को लखनऊ में मौसम आधारित राज्य स्तरीय कृषि परामर्श समूह (क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप) की वर्ष 2026-27 की पांचवीं बैठक आयोजित की। बैठक में परिषद के उप महानिदेशक डॉ. संजीव कुमार, के साथ ही भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, कृषि विभाग, भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, मत्स्य विभाग, कृषि विश्वविद्यालयों, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, वर्ल्ड बैंक तथा विभिन्न कृषि विशेषज्ञों ने भाग लेकर अपने इनपुट दिए।
अगले दो हफ्तों के लिए किसानों को सलाह
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार 1 जून से 9 जुलाई तक उत्तर प्रदेश में सामान्य वर्षा की तुलना में 27 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। इस अवधि में प्रदेश का दीर्घकालिक सामान्य वर्षा औसत 160.8 मिलीमीटर है, जबकि वास्तविक वर्षा केवल 117.8 मिलीमीटर दर्ज हुई, पूर्वांचल के जिलों में 48 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षा का यह असमान वितरण खरीफ फसलों की बढ़वार पर सीधा प्रभाव डाल सकता है। जिन क्षेत्रों में लगातार कम वर्षा हो रही है वहां नमी संरक्षण और जल प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण होगा।
अगले दो सप्ताह का मौसम कैसा रहेगा?
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार 10 जुलाई से 16 जुलाई के बीच प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में व्यापक वर्षा होने की संभावना है। हालांकि दक्षिणी-पश्चिमी अर्धशुष्क मैदानी क्षेत्र तथा पश्चिमी मैदानी क्षेत्र के कुछ भागों में सामान्य से कम वर्षा होने का अनुमान है।
विशेषज्ञों के अनुसार सप्ताह की शुरुआत में तापमान में 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तक गिरावट आ सकती है। इसके बाद दोबारा 4 से 6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी होने की संभावना है। प्रदेश का औसत अधिकतम तापमान 33 से 36 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है।
17 जुलाई से 23 जुलाई के बीच भी अधिकांश कृषि जलवायु क्षेत्रों में सामान्य वर्षा की संभावना है, हालांकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि वे स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के अनुसार ही सिंचाई, उर्वरक प्रबंधन और कीटनाशकों का छिड़काव करें।
खरीफ फसलों की बुवाई कहां तक पहुंची?
कृषि विभाग के अनुसार प्रदेश में खरीफ फसलों का कुल लक्ष्य 110.64 लाख हेक्टेयर निर्धारित किया गया है। 7 जुलाई तक केवल 36.41 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हो सकी है, जो कुल लक्ष्य का लगभग 32.91 प्रतिशत है। धान की रोपाई और बुवाई डीएसआर लगभग 23.45 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है।
मक्का लगभग 2.03 लाख हेक्टेयर, बाजरा 2.65 लाख हेक्टेयर, ज्वार 1.38 लाख हेक्टेयर, अरहर 1.20 लाख हेक्टेयर, उड़द 1.88 लाख हेक्टेयर, मूंग 0.26 लाख हेक्टेयर, तिल 1.18 लाख हेक्टेयर, मूंगफली 1.62 लाख हेक्टेयर तथा सोयाबीन लगभग 0.37 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बोई जा चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी सप्ताह में यदि अच्छी वर्षा होती है तो खरीफ बुवाई में तेजी आएगी।
किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सामान्य सलाह
मौसम आधारित राज्य स्तरीय कृषि परामर्श समूह बैठक में वैज्ञानिकों ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में खेती का सबसे बड़ा आधार जल प्रबंधन होगा। किसानों को सलाह दी गई है कि जहां भी संभव हो वर्षा जल का संचयन करें। खेत की मेड़ों को मजबूत रखें ताकि बारिश का पानी खेत से बाहर न निकले। यही पानी आगे चलकर जीवन रक्षक सिंचाई के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
जिन क्षेत्रों में अभी तक पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है वहां धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों के बजाय दलहन, तिलहन और श्री अन्न (मोटे अनाज) की खेती को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है। मिट्टी की उर्वरता और जलधारण क्षमता बढ़ाने के लिए जैविक खाद, गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट तथा जैव उर्वरकों के उपयोग पर विशेष जोर दिया गया है।
विशेषज्ञों ने कहा कि कीटनाशकों का छिड़काव केवल साफ मौसम में ही करें। यदि अगले 24 घंटे के भीतर वर्षा की संभावना हो तो छिड़काव टाल दें, अन्यथा दवा का प्रभाव कम हो जाएगा और किसानों का खर्च भी बढ़ेगा। धान की रोपाई वाले खेतों में लगभग एक फीट ऊंची मेड़ बनाने की सलाह दी गई है ताकि वर्षा का पानी अधिक समय तक खेत में सुरक्षित रह सके। गन्ना, दलहन, तिलहन तथा अन्य खरीफ फसलों में भी जैविक विधियों और संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने की सलाह दी गई।
किसानों के लिए मौसम आधारित खेती क्यों जरूरी?
विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बारिश का समय, मात्रा और वितरण लगातार बदल रहा है। ऐसे में पुराने अनुभवों के आधार पर खेती करने के बजाय मौसम आधारित वैज्ञानिक सलाह को अपनाना समय की आवश्यकता बन गया है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसान मौसम विभाग की चेतावनियों, कृषि विश्वविद्यालयों की सलाह और कृषि विभाग द्वारा जारी एडवाइजरी के अनुसार खेती करेंगे तो कम वर्षा, अधिक तापमान और अनियमित मानसून जैसी परिस्थितियों में भी नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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