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MP के 'फांसी आंदोलन' की गूंज PMO तक, जानिए क्यों विरोध कर रहे हैं आदिवासी

मध्य प्रदेश के छतरपुर में केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में आदिवासियों का आंदोलन तेज हो गया है। उचित मुआवजा और पुनर्वास नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए वे पिछले कई दिनों से धरना और अनशन कर रहे हैं। आंदोलन की गूंज प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंचने के बाद केंद्र ने राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी है।

Pooja Rai

Pooja Rai·18 Jul 2026

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर आदिवासियों का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है।

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर आदिवासियों का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है।

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर आदिवासियों का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। उचित मुआवजा और न्यायपूर्ण पुनर्वास नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए आदिवासी पिछले करीब 15 दिनों से अनशन, चिता सत्याग्रह, फांसी सत्याग्रह और सूली आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन की गूंज अब दिल्ली तक पहुंच गई है। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने पूरे मामले में मध्य प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी है। वहीं, प्रशासन का कहना है कि परियोजना से प्रभावित परिवारों को नियमानुसार मुआवजा दिया जा चुका है।

क्या है केन-बेतवा लिंक परियोजना?

केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की पहली राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना है। इसका उद्देश्य केन नदी का पानी नहर और सुरंग के जरिए बेतवा नदी तक पहुंचाना है। इसके तहत 221 किलोमीटर लंबी नहर और 2 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाई जाएगी।

सरकार का दावा है कि इस परियोजना से हर साल 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई, करीब 62 लाख लोगों को पेयजल और 103 मेगावाट जलविद्युत तथा 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होगा।

आदिवासी क्यों कर रहे हैं विरोध?

परियोजना के लिए छतरपुर जिले के कई गांवों की जमीन का अधिग्रहण किया गया है। आंदोलन कर रहे आदिवासियों का आरोप है कि सरकार ने उनकी जमीन तो ले ली, लेकिन बदले में उचित मुआवजा नहीं दिया। उनका कहना है कि कुछ परिवारों को पूरा मुआवजा मिला, कुछ को कम मिला, जबकि कई प्रभावित परिवार अब भी मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं।

आदिवासियों का यह भी आरोप है कि समान जमीन होने के बावजूद पुरुष और महिला खाताधारकों को अलग-अलग मुआवजा पैकेज दिया गया। आंदोलनकारियों का दावा है कि इस परियोजना से 50 हजार से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं।

बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं भी आंदोलन में शामिल

इस आंदोलन में बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं भी शामिल हैं। उनका कहना है कि जब वोट देने के अधिकार में पुरुष और महिलाएं बराबर हैं, तो मुआवजा पैकेज में भेदभाव क्यों किया जा रहा है।

महिलाओं का आरोप है कि विरोध करने पर उन्हें धमकाया जाता है, मारपीट की जाती है और उनके परिवार के लोगों पर झूठे केस दर्ज करने की धमकी दी जाती है। उनका कहना है कि वे केवल उचित मुआवजा और न्यायपूर्ण पुनर्वास की मांग कर रही हैं, लेकिन उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है।

'मुआवजे से नई जिंदगी बसाना संभव नहीं'

आंदोलन में शामिल आदिवासियों का कहना है कि जमीन के बदले उन्हें जितनी राशि दी जा रही है, उससे दूसरी जगह जमीन खरीदना, नया घर बनाना और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च उठाना संभव नहीं है। उनका कहना है कि सरकार उन्हें बाजार दर के अनुसार न्यायपूर्ण मुआवजा दे।

आदिवासियों ने मुआवजा वितरण में अनियमितता और भ्रष्टाचार के भी आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

जय किसान संगठन ने क्या लगाए आरोप?

जय किसान संगठन के सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर का आरोप है कि केन-बेतवा परियोजना में मुआवजे की बड़ी राशि प्रभावित परिवारों तक नहीं पहुंची। उनका दावा है कि करीब 63 प्रतिशत मुआवजा कथित तौर पर दलालों के पास चला गया, जबकि प्रभावित आदिवासी परिवारों को उनका पूरा हक नहीं मिला। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

भूमि अधिग्रहण कानून का पालन नहीं करने का आरोप

कुछ आदिवासियों का कहना है कि जमीन अधिग्रहण से पहले उनकी आपत्तियों और सुझावों पर ठीक से विचार नहीं किया गया। उनका आरोप है कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013 के प्रावधानों का सही तरीके से पालन नहीं हुआ।

आदिवासियों का यह भी कहना है कि जिन परिवारों के घर तोड़े गए, उन्हें समय पर उचित मुआवजा नहीं मिला। वहीं, जिन स्थानों पर उनका पुनर्वास किया गया है, वहां सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।

पहली बार नहीं हो रहा विरोध

यह पहली बार नहीं है जब आदिवासी इस मुद्दे को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इससे पहले अप्रैल में भी उन्होंने मुआवजे की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था। उस समय प्रशासन ने बातचीत के बाद उनकी मांगों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया था, जिसके बाद आंदोलन समाप्त कर दिया गया था। हालांकि, आंदोलनकारियों का कहना है कि वादे पूरे नहीं हुए, इसलिए उन्हें दोबारा आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।

प्रशासन का क्या कहना है?

प्रशासन का कहना है कि परियोजना से प्रभावित परिवारों को नियमों के अनुसार मुआवजा दिया जा चुका है। अधिकारियों के मुताबिक, पुनर्वास और मुआवजा प्रक्रिया भी तय नियमों के तहत पूरी की जा रही है।

हालांकि, आंदोलन कर रहे आदिवासियों का कहना है कि बड़ी संख्या में प्रभावित परिवार आज भी उचित मुआवजे और पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं। अब प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने के बाद इस पूरे मामले पर सभी की नजरें टिकी हैं।

पूरी रिपोर्ट यहां दिखिए-

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