Skip to content
News Potli
  • खेती किसानी
  • एग्री बुलेटिन
  • मौसम बेमौसम
  • पशुपालन
  • साक्षात्कार
  • बाज़ार
  • ग्राउन्ड रिपोर्ट्स
  • कमाई वाली बात
सहयोग करें
News Potli
  • खेती किसानी
  • एग्री बुलेटिन
  • मौसम बेमौसम
  • पशुपालन
  • साक्षात्कार
  • बाज़ार
  • ग्राउन्ड रिपोर्ट्स
  • कमाई वाली बात
सहयोग करें
Share
WhatsAppFacebookX / Twitter
  1. Home
  2. एग्री बुलेटिन
  3. बांकुरा की ईंटें: एक बिखरती ज़िंदगी की तस्वीर!
एग्री बुलेटिन

बांकुरा की ईंटें: एक बिखरती ज़िंदगी की तस्वीर!

कभी मध्यम स्तर के उद्योगों की वजह से जानी जाने वाली पश्चिम बंगाल के बांकुरा की ज़मीन आज मज़दूरी और शोषण की मार झेल रही है। यहां की ईंट भट्टा इंडस्ट्री में हर साल नवंबर से उसके अगले साल मई तक करीब 40,0

NP

Jalish· Correspondent

12 अप्रैल 2025· 3 min read

agriculture newskheti kisaniMGNREGA
बांकुरा की ईंटें: एक बिखरती ज़िंदगी की तस्वीर!

बांकुरा की ईंटें: एक बिखरती ज़िंदगी की तस्वीर!

बांकुरा, पश्चिम बंगाल। मध्यम स्तर के उद्योगों की वजह से जानी जाने वाली पश्चिम बंगाल के बांकुरा की ज़मीन आज मज़दूरी और शोषण की मार झेल रही है। यहां की ईंट भट्टा इंडस्ट्री में हर साल नवंबर से उसके अगले साल मई तक करीब 40,000 मज़दूर काम करते हैं, लेकिन इनकी मेहनत का मोल ना के बराबर है।

बांकुरा में लगभग 400 ईंट भट्टे हैं। इन भट्टों पर मज़दूर 9-10 घंटे काम करते हैं—मिट्टी काटना, गूंथना, सांचे में डालना, सुखाना और भट्ठी तक पहुंचाना। ये सब इन्हीं का काम है। इस मजदूरी के बदले इन्हीं दिहाड़ी सिर्फ 200-250 रुपये ही मिलती है, जिसमें पेट पालना बहुत मुश्किल है।

इस काम में सबसे बड़ी संख्या महिलाओं की है। कई परिवारों का कहना है कि उन्हें मजबूरी में अपने स्कूली बच्चों को भी साथ लाना पड़ता है। न्यूज़ पोटली से बात करते हुए पॉयाबगान के एक भट्टे पर काम करने वाली मालती माला ने बताया, “यहां मजदूरी बहुत कम है। जितना मिलता है उसमें गुजारा नहीं हो पाता। इसलिए हाथ बंटाने के लिए बच्चों को भी लाना पड़ता है, इससे काम में थोड़ी आसानी हो जाती है, और ज्यादा ईंट बना पाने की वजह से रुपये भी थोड़ा ज्यादा मिल जाता है।”

ये भी पढ़ें - जैविक खेती का पूरा इकोसिस्टम तैयार करेगी बिहार सरकार: कृषि मंत्री विजय कुमार सिंह

हालांकि मालिकों का दावा है कि, 1000 कच्ची ईंटें तैयार करने पर मज़दूरों को 1000 रुपये दिए जाते हैं, लेकिन मज़दूरों का तर्क है, क्योंकि ये काम कई मजदूर मिलकर करते हैं, इस वजह से पैसे बट जाते हैं और उनके हिस्से सिर्फ 200-250 रुपये ही आते हैं।

बुनियादी जरूरतों की कमी
अपनी रिपोर्ट में न्यूज़ पोटली ने पाया, ज्यादातर किसान ईंट-भट्टों के पास ही अस्थायी मकान बना कर रह रहे हैं। यहां ना सही से शौचालय की व्यवस्था है, और ना ही बाकी दूसरी बुनियादी सहूलीयत है। मज़दूरों ने हमे बताया कि, ज्यादातर वही लोग खाना बनाते हैं। ज्यादातर उनकी थाली चावल और आलू ही होता है, क्योंकि ये बाकी राशन के मुकाबले उन्हें सस्ता पड़ता है।

MGNREGA के तहत मिलने वाला काम पिछले चार साल से बंद
बांकुरा कभी फेरो और स्पंज आयरन इंडस्ट्री का केंद्र हुआ करता था, लेकिन बीते दशक में बाज़ार में गिरावट और राजनीतिक दखल के चलते ये उद्योग बंद हो गए। इसके बाद से हज़ारों लोगों के पास रोज़गार का कोई स्थायी ज़रिया नहीं बचा।
अपनी investigation में हमने पाया कि MGNREGA के तहत मिलने वाला काम भी पिछले चार साल से बंद है। केंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते भुगतान रोक दिया, और राज्य सरकार भी कुछ नहीं कर रही है। नतीजा, 50,000 से ज़्यादा युवा प्रवासी मज़दूर बन चुके हैं।

प्रशासन की बेरुखी?
जब न्यूज़ पोटली ने इस बारे में बांकुरा के सहायक श्रम आयुक्त से बात की, तो उनका जवाब था, “हमें किसी भी तरह की शिकायत नहीं मिली है। अगर जानकारी दी जाती है, तो हम कार्रवाई करेंगे।”
हकीकत जो भी हो, लेकिन सच्चाई है, जिनकी मेहनत के आपके आशियाने बनकर तैयार होत हैं, सरकार और प्रशासन की बेरुखी की वजह से आज उन्हें छत तक मयस्सर नहीं है।

न्यूज़ पोटली के लिए पश्चिम बंगाल से मधुसूदन चैटर्जी की रिपोर्ट

ये देखें -

News Potli.
Clip & Share
“

— बांकुरा की ईंटें: एक बिखरती ज़िंदगी की तस्वीर!

newspotli.comIndia's #1 Rural Journalism Platform
NP

About the Author

Jalish

Correspondent

सभी लेख देखें
Related Coverage

और पढ़ें.

ILDC कॉन्फ्रेंस 2025: कृषि की चुनौतियों में किरायेदार किसान, कैसे मिले सुरक्षा और अधिकार!
एग्री बुलेटिन

ILDC कॉन्फ्रेंस 2025: कृषि की चुनौतियों में किरायेदार किसान, कैसे मिले सुरक्षा और अधिकार!

भारत एक कृषि प्रधान देश हैं। जहां एक व्यापक किसान वर्ग कृषि पर आश्रित है। इस किसान वर्ग में एक बड़ी आबादी किरायेदार किसानों की भी है। इन किरायेदार किसानों को असलियत में किसान नहीं माना जाता है। इस स्थ

Pooja Rai·28 फ़र॰ 2026·9 min
भारत-अमेरिका डील के बाद GM फसलों पर क्यों बढ़ी बहस?
एग्री बुलेटिन

भारत-अमेरिका डील के बाद GM फसलों पर क्यों बढ़ी बहस?

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बाद GM (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलों को लेकर बहस तेज हो गई है। भारत ने कुछ अमेरिकी कृषि उत्पादों पर कम या शून्य शुल्क देने की सहमति दी है, लेकिन सरकार का कहना है कि संवेदनश

Pooja Rai·9 फ़र॰ 2026·3 min
राष्ट्रीय दलहन क्रांति: बिहार को दलहन खेती बढ़ाने के लिए 93.75 करोड़ की मदद
एग्री बुलेटिन

राष्ट्रीय दलहन क्रांति: बिहार को दलहन खेती बढ़ाने के लिए 93.75 करोड़ की मदद

सीहोर में आयोजित राष्ट्रीय दलहन कार्यक्रम में केंद्र ने देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने की पहल शुरू की और बिहार को 93.75 करोड़ रुपये की सहायता दी। बिहार सरकार ने पांच साल में दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर ब

Pooja Rai·9 फ़र॰ 2026·2 min
News Potli

न्यूज़ पोटली

भारत के गाँव और किसान की आवाज़

Platform

  • About Us
  • Our Team
  • Pitch Your Story
  • Privacy Policy
  • Terms of Service

Contact Us

© 2026 News Potli. All rights reserved.

Crafted byBuildRocket LabsBuildRocket Labs