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गर्म फरवरी कैसे गेहूं के उत्पादन के लिए फिर मुश्किल बन सकती है?

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादन करने वाला देश है। 2024 में हमने 112.9 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन किया था, जो 2023 के मुकाबले 2.9% ज्यादा था, लेकिन उम्मीदों से काम। 2022 में फरवरी और मार्च

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Jalish· Correspondent

31 जनवरी 2025· 3 min read

गर्म फरवरी कैसे गेहूं के उत्पादन के लिए फिर मुश्किल बन सकती है?

गर्म फरवरी कैसे गेहूं के उत्पादन के लिए फिर मुश्किल बन सकती है?

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादन करने वाला देश है। 2024 में हमने 112.9 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन किया था, जो 2023 के मुकाबले 2.9% ज्यादा था, लेकिन उम्मीदों से काम। 2022 में फरवरी और मार्च में अचानक तापमान बढ़ने से फसल खराब होने के कारण भारत को इस साल गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा था। हम उम्मीद लगाए बैठे थे कि, 2025 में उत्पादन बढ़ेगा, लेकिन फरवरी में अधिकतम तापमान औसत तापमान से 5 डिग्री ज्यादा होने के आसार है, जिसका सीधा असर गेहूं के उत्पादन पर पड़ेगा। ऐसे में सवाल ये है कि, जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ता तापमान क्या गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए खतरे की घंटी है, अगर है तो इसका भारत के गेहूं उत्पादन पर कितना असर पड़ेगा?

2024 लगातार चौथा साल हो सकता है जब भारत में गेहूं का उत्पादन उम्मीदों से कम हो सकता है। जिससे कुल उत्पादन में गिरावट आ सकती है। इसके परिणामस्वरूप, सरकार को गेहूं के आयात पर लगे 40% शुल्क को कम या हटाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, ताकि कमी को पूरा किया जा सके। जानकारों का कहना है कि उत्तर, मध्य और पूर्वी राज्यों में फरवरी में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।

ये भी पढ़ें: सरकार कृषि क्षेत्र के आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता के लिए कर रही है काम : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू

भारत में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के साथ मध्य प्रदेश शीर्ष गेहूं उत्पादक राज्य हैं। असामान्य रूप से गर्म मौसम से उत्पादन में गिरावट और सरकारी भंडार में भारी कमी हो सकती है। इसके कारण, इस महीने की शुरुआत में गेहूं की कीमत रिकॉर्ड 33,250 रुपये ($384.05) प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी।

अगर फरवरी में तापमान औसत से ज्यादा रहता है, तो इसका असर सीधा गेहूं के उत्पादन पर पड़ेगा। नतीजा चौथे साल पैदावार में गिरावट आ सकती है, जिससे कुल उत्पादन में कमी हो सकती है। इससे सरकार को गेहूं की कमी को पूरा करने के लिए 40 प्रतिशत आयात शुल्क को कम या हटाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

यही नहीं अक्टूबर से दिसंबर के बीच बोई जाने वाली सर्दियों की फसलें, जैसे गेहूं, सरसों और चना, अच्छे उत्पादन के लिए ठंडे मौसम की जरूरत होती है। सरसों की फसल में गिरावट भारत को, जो दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक है। ऐसे में अगर ठंड के मौसम में लगातार औसत तापमान बढ़ता रहा तो इस असर अनाज भंडराण पर पड़ेगा। आम लोगों को खाने की चीजें मंहगी खरीदनी पड़ सकती है।

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