छतरपुर (मध्य प्रदेश)। छतरपुर जिला मुख्यालय से लगभग 52 किमी दूर कूप गांव में बराना नदी में 17 दिनों तक चला आंदोलन जिला प्रशासन ने भले ही रविवार 19 जुलाई को खत्म करवा दिया। लेकिन आंशिक आंदोलन अब भी जारी है। सत्याग्रह के मुखिया और समाजसेवी अमित भटनागर अस्पताल में हैं। नदी के किनारे सैकड़ों की संख्या में आंदोलन करने वाले आदिवासियों में से कुछ लोग अब भी मौके पर हैं और आंदोलन जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इनकी मांगें अभी भी नहीं मानी गई हैं।
लगभग 44 हजार करोड़ रुपए की लागत वाली भारत की पहली नदी जोड़ो परियोजना केन बेतवा लिंक परियोजना के तहत मध्य प्रदेश, बुंदेलखंड के जिला पन्ना और छतरपुर के कुल 22 गांव प्रभावित हो रहे हैं। इन गांवों के किसान और आदिवासियों के विस्थापन की प्रक्रिया चल रही है। घर गिराये जा रहे हैं। केन-बेतवा लिंक परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए भारत सरकार, मध्य प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच 25 अगस्त 2005 को एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके बाद, राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (एनडब्ल्यूडीए) ने अप्रैल 2010 में परियोजना के चरण-I की डीपीआर तैयार की। वहीं, चरण-II की डीपीआर जनवरी 2014 में पूरी की गई।

परियोजना के क्रियान्वयन के लिए भारत सरकार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता (एमओए) पर 22 मार्च 2021 को हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते पर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों तथा तत्कालीन जल शक्ति मंत्री ने प्रधानमंत्री की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए। इसके बाद से छतरपुर-पन्ना सीमा पर बसे ढोढ़न गांव में बांध निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। वहीं सरकार का दावा है कि योजना से लाखों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और पेयजल आपूर्ति होगी जिससे बुंदेलखंड की तस्वीर बदलेगी। लेकिन आंदोलन करने वाले आदिवासियों का कहना है कि उनसे उनका सब कुछ छीना जा रहा है। इसके एवज में मिलने वाला मुआवजा बेहद कम है।
आदिवासी आखिर सरकार से चाहते क्या हैं?
बड़ा सवाल तो यही है कि इन्हें सरकार से क्या चाहिए? इसी साल अप्रैल में भी आदिवासी और किसानों ने अपनी कई मांगों को लेकर आंदोलन किया था जिसे तब भी ऐसे ही खत्म करा दिया गया था। तब उन्हें आश्वासन दिया गया था। लेकिन जब आश्वासन पर कुछ हुआ नहीं तो तीन जुलाई से आंदोलन ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली।
आंदोलन की अगुवाई करने वाले अमित भटनागर ने न्यूज पोटली से कहा,"इस प्रोजेक्ट के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व का एक बड़ा भूभाग जलमग्न हो जाएगा और करीब 46 लाख पेड़ काटे जाएंगे। किसान और आदिवासियों को सही मुआवजा नहीं मिला, पुनर्वास और बेदखली की प्रक्रिया में धांधली और भ्रष्टाचार किया गया।"

वहीं विस्थापित परिवारों का कहना है कि छतरपुर के दौधन और डोंगरिया समेत विभिन्न गांवों में बिना बताए और बिना पूरा मुआवजा दिए उनके घरों को बुलडोजर से गिरा दिया गया। ग्रामीणों की मांग है कि प्रत्येक पात्र विस्थापित परिवार को मिलने वाला पुनर्वास पैकेज 5 लाख रुपए से बढ़ाकर 12.50 लाख रुपए किया जाए और डूब क्षेत्र के सभी प्रभावितों के लिए नए पुनर्वास गांव बसाए जाएं। आंदोलनकारी यह भी आरोप लगा रहे हैं कि केन-बेतवा लिंक परियोजना में करीब 400 करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है।

उधर, विस्थापितों के बढ़ते विरोध को देखते हुए शासन ने राहत पैकेज में संशोधन का आश्वासन दिया है। सरकार का कहना है कि पात्र परिवारों को 12.50 लाख रुपए की एकमुश्त सहायता या फिर प्लॉट के साथ मकान निर्माण अनुदान देने पर विचार किया जा रहा है।
हालांकि जिला प्रशासन ने 17 दिनों तक चले चिता सत्याग्रह खत्म करा दिया, लेकिन विस्थापित किसानों का कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक जल, जमीन और जीवन की उनकी लड़ाई जारी रहेगी।





