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तकनीक से तरक्की

5 बिस्वा से 50 बीघा तक का सफर: फसल कैलेंडर और स्मार्ट मार्केटिंग से बदली खेती की तस्वीर

चंदौली के युवा किसान अनिल मौर्य ने सिर्फ 5 बिस्वा से शुरुआत कर आज 50 बीघा में आधुनिक खेती का सफल मॉडल खड़ा किया है। बागवानी, ड्रिप सिंचाई, स्मार्ट मार्केटिंग और फसल कैलेंडर के जरिए उन्होंने नई फसलों क

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Pooja Rai· Correspondent

24 दिसंबर 2025· 3 min read

agriculture newsChandauliDrip irrigation
5 बिस्वा से 50 बीघा तक का सफर: फसल कैलेंडर और स्मार्ट मार्केटिंग से बदली खेती की तस्वीर

5 बिस्वा से 50 बीघा तक का सफर: फसल कैलेंडर और स्मार्ट मार्केटिंग से बदली खेती की तस्वीर

चंदौली के युवा किसान अनिल मौर्य ने सिर्फ 5 बिस्वा से शुरुआत कर आज 50 बीघा में आधुनिक खेती का सफल मॉडल खड़ा किया है। बागवानी, ड्रिप सिंचाई, स्मार्ट मार्केटिंग और फसल कैलेंडर के जरिए उन्होंने नई फसलों को अपनाया और बेहतर दाम हासिल किए। कई असफलताओं के बाद भी हार न मानने वाले अनिल मौर्य आज किसानों के लिए प्रेरणा और सीख का केंद्र बन चुके हैं।

पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश) के चंदौली जिले के युवा और प्रगतिशील किसान अनिल मौर्य ने बागवानी, आधुनिक तकनीक, पार्टनरशिप फार्मिंग और स्मार्ट मार्केटिंग के जरिए खेती को एक नया मुकाम दिया है। सिर्फ 5 बिस्वा जमीन से खेती शुरू करने वाले अनिल आज लीज पर ली गई करीब 50 बीघा (लगभग 31 एकड़) जमीन में सफल खेती कर रहे हैं।

अनिल मौर्य ने अपने इलाके में पहली बार स्ट्रॉबेरी, ड्रैगन फ्रूट, जापानी पिंक अमरूद, सहजन, सालभर फल देने वाला कटहल, सिट्रस फल, सेब (हर्मन-99) और एवोकाडो जैसी फसलों की खेती शुरू की। उन्हें बिहार के “हॉर्टिकल्चर किंग” सुधांशु कुमार से प्रेरणा मिली। अनिल का मानना है कि खेती में सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि सही योजना और बाजार की समझ सबसे ज्यादा जरूरी है।

अनिल मौर्य कहते हैं,
“हम मौसम, फसल कैलेंडर और त्योहारों को देखकर खेती करते हैं। देखते हैं कि कौन सा फेस्टिवल आने वाला है और उस समय बाजार में किस फसल की मांग होगी। उसी हिसाब से फसल लगाते हैं और यही बात हम दूसरे किसानों को भी समझाते हैं।”

उन्होंने अपनी उपज को बेचने के लिए 10 मंडियों तक सीधी पहुंच बनाई, पथरीली जमीन पर ड्रिप सिंचाई अपनाई और खेती के साथ एग्रो-टूरिज्म, सोलर ड्रायर यूनिट और किसान प्रशिक्षण केंद्र भी विकसित किए। 12 साल के सफर में उन्हें 8 बार असफलता मिली, लेकिन हर असफलता से सीख लेकर उन्होंने आगे बढ़ने का रास्ता बनाया।

बेहतर दाम पाने के लिए अनिल मौर्य सिर्फ एक मंडी पर निर्भर नहीं रहते। वे बताते हैं,
“हम कम से कम 10 मंडियों में जाते हैं और जहां अच्छा भाव मिलता है, वहीं अपनी उपज बेच देते हैं।”

अनिल बताते हैं कि साल 2018–19 में उन्होंने पहली बार स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की थी। उस समय पूर्वांचल में कोई भी किसान स्ट्रॉबेरी नहीं उगाता था और वाराणसी की मंडियों में भी इसकी बिक्री नहीं होती थी, लेकिन उन्होंने जोखिम उठाया और नई राह बनाई।

सिंचाई के तरीकों में भी उन्होंने बड़ा बदलाव किया।वे बताते हैं,
“पहले हम फ्लड सिंचाई करते थे। फिर ड्रिप इरिगेशन के बारे में जानकारी मिली। किसानों से बात की और जैन इरिगेशन की सर्विस देखकर हमने भी ड्रिप लगाया। इससे पानी बचा और उत्पादन बेहतर हुआ।“

खेती के साथ उन्होंने एग्रो-टूरिज्म, सोलर ड्रायर यूनिट और किसान प्रशिक्षण केंद्र भी विकसित किए, जिससे दूसरे किसानों को सीखने का मौका मिल रहा है। उनके खेत आज एक तरह की खुली पाठशाला बन चुके हैं।

अनिल मौर्य को उनके काम के लिए सम्मान भी मिला है।उन्होंने बताया कि,
“2021 में राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने हमें सम्मानित किया। इसके अलावा हर साल 23 दिसंबर किसान दिवस पर जिला अधिकारी से प्रशस्ति पत्र मिलता है। इससे हौसला बढ़ता है और एक जिम्मेदारी भी होती है कि हम और अच्छा करें और दूसरे किसानों को भी प्रेरित करें,”

अनिल मौर्य का सफलता मंत्र है—
“कमाई का 90 फीसदी निवेश खेती और कारोबार में करो, और सिर्फ 10 फीसदी जीवनशैली पर खर्च करो।”

यह कहानी ‘तकनीक से तरक्की’ अभियान का हिस्सा है, जिसे न्यूज़ पोटली और जैन इरिगेशन मिलकर चला रहे हैं। अनिल मौर्य की यह यात्रा आज हजारों किसानों के लिए प्रेरणा बन चुकी है, जो तकनीक और सही सोच के साथ खेती को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

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