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तकनीक से तरक्की

गुजरात के कच्छ का किसान मजदूर से कैसे बन गया Mango King?

कच्छ के किसान बटुक सिंह जडेजा करीब 350 एकड़ में केसर आम की बागवानी करते हैं। उनका सालाना टर्नओवर करोड़ों में है। गुजरात का कच्छ, भारत का सबसे बड़ा जिला। यहां दुनिया का सबसे बड़ा खारा रेगिस्तान है। 45

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Jalish· Correspondent

26 जून 2025· 6 min read

batuk sinnh jadegaDrip irrigationgujarat
गुजरात के कच्छ का किसान मजदूर से कैसे बन गया Mango King?

गुजरात के कच्छ का किसान मजदूर से कैसे बन गया Mango King?

कच्छ के किसान बटुक सिंह जडेजा करीब 350 एकड़ में केसर आम की बागवानी करते हैं। उनका सालाना टर्नओवर करोड़ों में है।

गुजरात का कच्छ, भारत का सबसे बड़ा जिला। यहां दुनिया का सबसे बड़ा खारा रेगिस्तान है। 45,674 वर्ग किलोमीटर में फैला ये जिला गुजरात का 23.27 फीसदी हिस्सा है। इस जिले में 10 तालुका, 939 गांव और 6 नगर निगम हैं। नमक का रण कहे जाने वाले कच्छ में खेती एक बड़ी चुनौती है। इसी पर ज़मीन देश के प्रगतिशील किसान बटुक सिंह जडेजा ने वो कर दिया, जो उनसे पहले आज तक कोई नहीं कर सका था।

बटुक सिंह जडेजा 350 एकड़ में केसर आम की बागवानी करते हैं। उनके बाग में करीब 35000 पेड़ लगे हैं। उनका आम अमेरिका, लंदन के साथ खाड़ी के कई देशों में जाता है। उनका सालाना टर्नओवर करोड़ों में है।

“2004 में मैंने पहली बार आम लंदन भेजा। व्यापारी ने कहा कि, केसर की इंटरनेशनल मार्केट में कोई पहचान नहीं है, लेकिन अल्फांसो की पूरी दुनिया में पहचान है। मैंने कहा कोई बात नहीं, लेकिन आप ऐसा लिखना जरूरी कि केसर कच्छ में हुआ। इसको पहचान दो। दूसरी मुश्किल ये थी कि, पाकिस्तान के सिंध का आम था चौसा, और सिंधरी पूरी दुनिया इसे पहचानती है। मैंने व्यापारी को भरोसा दिलाया कि जो इसको खाएगा ना उसको भूल जाएगा। मेरे को फोन आया 2-4 दिन के बाद हमारा जो 12 पीस का बॉक्स होता है, वो 8 पाउंड में जाता है। पाकिस्तान का 10 पाउंड में। मैंने का एक दो दिन और उसको जल्दी से जल्दी भेजो। क्योंकि रिटर्न ग्राहक होता है। फिर 2-4 दिन में फोन आया कि अपना तो अब 12 पाउंड में जा रहा है। दूसरे साल 2005 में मैंने जहाज से आम भेजा”

बटुक सिंह जडेजा बताते हैं, उनका आम विदेशों में क्वालिटी चेक के दौरान सारे पैरामीटर्स पर पूरी तरह से खरा उतरता है। वो बागवानी में जीरो पेस्टीसाइड का इस्तेमाल करते हैं। उनके पूरे बाग में ड्रिप इरीगेशन सिस्टम लगा है। वो बताते हैं इसके बिना यहां खेती संभव ही नहीं है। अभी किसान को बचना है तो हॉर्टीकल्चर में जाना पड़ेगा। हॉर्टीकल्चर एक पीढ़ी अगर मेहनत कर दे तो दूसरी पीढ़ी को कुछ खास करने की जरूरत नहीं पड़तीह है। इसके साथ ही हम जिस इलाके में खेती करना चाहते हैं, उस इलाके के क्लाइमेट को भी समझना बहुत जरूरी है।

“30-40 साल पहले पानी का लेवल बहुत ऊपर था। तब ज्यादातर लोगों ने पानी को इतनी अहमियत नहीं दी। सिंचाई में अंधा-धुंध पानी का इस्तेमाल किया, नतीजा वक्त के साथ पानी का लेवल बहुत नीचे चला गया। हमने काफी पहले ही खेती में ड्रिप इरीगेश की अहमियत को समझ लिया था। उस वक्त कुछ लोग हमसे कहते थे, टिप-टिप पानी आता है इससे क्या ही होगा? हमने लोगों को बताया खेत को भर कर पानी नहीं चाहिए, नमी चाहिए।“

बागवानी में कामयाबी की ही देन है कि, आज कच्छ के किसान ने अपने एक बेटे को डॉक्टर बनाया। दूसरे को MBA कराया, लेकिन नौकरी दोनों नहीं करते। MBA की पढ़ाई करने वाला बेटा आम की मार्केटिंग में उनकी मदद करता है। बटुक सिंह सिंह जडेजा यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आइडिया पर चलते हैं। उनका मानना है कि, नौकरी की जरूरत नहीं है। बिजनेस को सफल बनाइए और लोगों को नौकरी पर रखिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद उन्हें सम्मानित कर चुके हैं।

“हमारे गुजरात में कॉम्टीशन होता है। उसमें मैं गया, मेरे को मालूम नहीं था। उस वक्त मेरे को फर्स्ट नंबर आया। ऐसे 4-5 साल मेरे आम को पहला नंबर आया। एक बार मोदी साहब ने मुझे प्रोत्साहन राशि दी। 2006 में मोदी साहब ने मेरे को सिंगापुर भेजा। वहां भी कॉन्फ्रेंस थी। भारत के हाई कमिश्नर ने मेरे को भेजा था कि, वहां पर जाओ। गुजरात से मुझे अकेले को भेजा था। वहां भी बढ़िया नाम हुआ हमारा।”

बटुक सिंह जडेजा आज कामयाबी के जिस शिखर पर हैं, इसके पीछे उनकी कड़ी मेहनत है। खेती में उनकी दूरदर्शिता है। एक वक्त वो भी था जब वो ओमान में मजदूरी करते थे। कुछ वक्त के लिए उन्होंने वहां पर खेती भी की, इसी दौरान ही उन्हें भारत वापस लौट कर खेती करने का ख्याल आया। दरअसल 1977 में उनके तालुका में अकाल पड़ा, जिसकी वजह से यहां से लोग कमाने के लिए विदेश भागने लगे। बटुक सिंह भी उम्र उस वक्त बहुत छोटी थी, लेकिन जिम्मेदारियों का बोझ बहुत ज्यादा। उन्हें जब कोई काम समझ नहीं आया तो वो भी ओमान चले गए और वहां कई सालों तक नौकरी की।

“उस वक्त फोन नहीं था। चिट्ठी से मां बाप का हाल चाल लेते था। मैं वहां लिखता था कि, यहां सब्जी का बीज भेजो तो वहां कोई आदमी आए तो यहां बीज भेज दो। मैंने वहां बीज लगाया तो कुछ दिन के बाद सब्जी वहां बहुत हो गया।“

1984 में बटुक सिंह जडेजा ने अपने इलाके के किसानों से क्षेत्र को आम का हब बनाने के लिए एक साथ आने की अपील की, लेकिन ज्यादातर ने साथ आने से मना कर दिया था। उस वक्त तक कच्छ के ज्यादातर इलाकों में पानी 300 फीट तक नीचे चला गया था। उस वक्त लाइट का ठिकाना नहीं था। खेती उस वक्त तक लगभग नामुमकिन सी नजर आने लगी थी। बजुट सिंह भी खेती को समझने के लिए पूरा गुजरात घूमे। ये समझा कि, किस इलाके में क्या बेहतर उगाया जा सकता है। यही नहीं वो खेती समझने के लिए इज़राइल भी गए। वहां जैन का इरीगेशन सिस्टम देखा।

1992 में 100 पेड़ों लगने के साथ बागवानी के सफर पर निकले बटुक सिंह आज भी कामयाबी के रास्ते पर चलते जा रहे हें। वो कहते हैं कि हॉर्टीकल्चर ऐसा बिजनेस है, जिसमें 20-30 पर्सेंट खर्चा लगेगा और 70 फीसदी का प्रॉफिट है। पहली बार जब उन्होंने 100 पेड़ लगाया तो कुछ वक्त बाद पाया 45 पौधों की क्वालिटी उस स्टैंडर्ड की नहीं है। तो उन्होंने उसे निकाल कर फेंक दिया। फिर उस 55 आम के पौधे का मदर प्लांट बनाया। देश का ये प्रगतिशील किसान खजूर की भी सघन बागवानी करते हैं। इसके साथ ही वो केले की खेती भी करते हैं। सिर्फ 7वीं तक पढ़े इस किसान ने खेती से वो मुकाम हासिल किया है, जिसका ख्वाब संजोए लोग अपनी पूरी उम्र काट देते हैं, फिर भी अक्सर उन्हें वो हासिल नहीं होता। देश का किसान कैसा होना चाहिए राम सिंह उसकी एक मिसाल बन गए हैं।

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