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आम के फलों की तुड़ाई के उपरांत बाग का प्रबंधन कैसे करें की अगले वर्ष अधिकतम एवं गुणवक्तायुक्त फल प्राप्त हों

जनवरी माह में कभी कभी बौर जल्दी निकल आते है ,यथासम्भव तोड़ देना चाहिए। इससे गुम्मा रोग का प्रकोप कम हो जाता है। बौर निकलने के समय पुष्प मिज कीट का प्रकोप दिखते ही क्विनालफास (1 मि.ली./लीटर ) या डामेथो

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Ashish· Correspondent

4 जुलाई 2023· 8 min read

आम के फलों की तुड़ाई के उपरांत बाग का प्रबंधन कैसे करें की अगले वर्ष अधिकतम एवं गुणवक्तायुक्त फल प्राप्त हों

आम के फलों की तुड़ाई के उपरांत बाग का प्रबंधन कैसे करें की अगले वर्ष अधिकतम एवं गुणवक्तायुक्त फल प्राप्त हों

डॉ. एस.के. सिंह (प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसन्धान परियोजना) का फेसबुक पोस्ट

आम के फलों की तुड़ाई के उपरांत बागों का प्रबंधन कैसे किया जाय, यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्नं है। क्योकि अभी किया हुआ बाग का प्रबंधन ही निर्धारित करेगा की अगले साल पेड़ पर कितने फल लगेंगे तथा उनकी गुणवक्ता कैसी होगी। आम की खेती की लाभप्रदता मुख्य रूप से सही समय पर बाग में किये जाने वाले विभिन्न कृषि कार्यो पर निर्भर करती है। एक भी कृषि कार्य या गतिविधि में देरी से बागवान को भारी नुकसान होता है और लाभहीन उद्यम हो कर रह जाता है। इसलिए आम उत्पादकों के लाभ को दृष्टिगत हेतु इस आलेख को लिखा गया है । इस लेख में फल की तुड़ाई के बाद से लेकर मंजर आने तक क्या किया जाना चाहिए को संकलित किया है। इन सुझावों को अपनाने से निश्चित रूप से फल उत्पादकों को उत्पादकता, गुणवत्ता के साथ-साथ लाभ में वृद्धि करने में मदद मिलेगी।

आम की फसल पर जलवायु का असर

इस समय बिहार में लगभग 75 प्रतिशत से अधिक आम के फलों की तुड़ाई हो चुकी है । बागवान यह जानना चाहता है की अब क्या करें की अगले साल उसकी उपज पर विपरीत प्रभाव न पड़े एवं फल गुणवक्तायुक्त हो। आम में एकांतर फलन की समस्या प्रमुख है। एकांतर फलन की समस्या को कम किया जा सकता है। यह समस्या उत्तर भारत में ज्यादा है क्योकि यहाँ पर सर्दी ज्यादा पड़ती है , जबकि इसके विपरीत दक्षिण भारत में एकांतर फलन की समस्या उत्तर भारत की तुलना में कम है इसका मुख्य कारण वहा सर्दी का कम पड़ना है।

अच्छे उत्पादन के लिए कल्टार का प्रयोग कैसे करना चाहिए-

हमारे यहाँ उत्तर भारत में आम की कटाई छटाई नही करते है, जबकि 5 से 10 प्रतिशत कटाई छटाई अवश्य करना चाहिए । जिन टहनियों से आम तोड़ते है उसकी ऊपर से कम से कम 10 से 15 सेमी लम्बाई में कटाई करने से उसमे नई टहनी निकलती है जिसमे फल लगते है । उपरी टहनियों की कटाई छटाई लीची में बहुत कॉमन है लेकिन आम में ऐसा नही करते है। हर साल फल आएं, यह सुनिश्चित करने के लिए कल्टार (पँक्लोब्युट्राझॉल) के प्रयोग करने की विधि जानना आवश्यक है, यह एक विकास निरोधक हार्मोन होता है। यह विकास निरोधक हार्मोन वनस्पतिक विकास रोक कर हर साल पुष्पन और फल लगना बढाता है। कल्टार की निश्चित मात्रा का उपयोग करते समय पेड़ की उम्र ध्यान मे न लेते हुए उसका आकर ध्यान मे लेना चाहिए। इस के लिए पेड़ का कुल विस्तार नापकर उसके आधार पर कल्टार की मात्रा निर्धारित की जा सकती है। साधारण रूप से पेड़ के फैलाव के प्रति मीटर व्यास के हिसाब से 3 से 4 मी.ली. कल्टार/ 20 लीटर पानी में घोलकर, आम के पेड़ के मुख्य तने के पास की मिट्टी में प्रयोग करते है । पेड़ का व्यास 2 मीटर होने पर दवा एवं पानी की मात्रा दुगुनी कर देते है, तीन मीटर होने पर दवा एवं पानी की मात्रा तीन गुणा इसी प्रकार 4 मीटर होने पर दवा एवं पानी कि मात्रा चार गुणा कर देते है । पहले साल इस दवा की पूरी मात्रा प्रयोग करते है, जबकि दूसरे साल दवा की मात्रा आधा कर देते है ,तीसरे साल एक तिहाई एवं चौथे साल चौथाई मात्रा ही प्रयोग में लाते है, पाँचवे साल दवा की पुनः पूरी मात्रा प्रयोग करते है । कल्टार के प्रयोग, इसकी पूरी जानकारी प्राप्त करने के बाद ही इसका प्रयोग करना चाहिए। इसके गलत प्रयोग से फायदा की जगह नुकसान भी हो सकता है , कभी कभी पेड़ सुख भी सकता है, अतः इसका प्रयोग हमेशा वैज्ञानिक देखरेख में ही होना चाहिए।

पेड़ को खाद कैसे देनी है-

रोगग्रस्त एवं सुखी टहनियों को काट देना चाहिए.इसके बाद खेत से खरपतवार निकलने के बाद 10 वर्ष या 10 वर्ष से बड़े आम के पेड़ों(वयस्क पेड़) के लिए 500 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फॉस्फोरस और 500 ग्राम पोटैशियम तत्व के रूप में प्रति पेड़ देना चाहिए । इसके लिए यदि हम लगभग 550 ग्राम डाई अमोनियम फास्फेट (DAP) ,850 ग्राम यूरिया एवम् 750 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश प्रति पेड़ देते है तो उपरोक्त पोषक तत्व की मात्रा पूरी हो जाती है। इसके साथ 20-25 किग्रा खूब अच्छी तरह से सड़ी गोबर या कम्पोस्ट खाद भी देना चाहिए । यह डोज 10 साल या 10 साल के ऊपर के पेड़(वयस्क पेड़) के लिए है। यदि उपरोक्त खाद एवम् उर्वरकों की मात्रा को जब हम 10 से भाग दे देते हैं और जो आता है वह 1साल के पेड़ के लिए है। एक साल के पेड़ के डोज में पेड़ की उम्र से गुणा करे, वही डोज पेड़ को देना चाहिए। इस तरह से खाद एवम् उर्वरकों की मात्रा को निर्धारित किया जाता है। वयस्क पेड़ को खाद एवं उर्वरक देने के लिए पेड़ के मुख्य तने से 2 मीटर दूरी पर 9 इन्च चौड़ा एवं 9 इंच गहरा रिंग पेड़ के चारों तरफ खोद लेते है। इसके बाद आधी मिट्टी निकाल कर अलग करने के बाद उसमे सभी खाद एवं उर्वरक मिलाने के बाद उसे रिंग में भर देते है ,इसके बाद बची हुई मिटटी से रिंग को भर देते है ,तत्पश्चात सिचाई कर देते है। 10 साल से छोटे पेड़ की कैनोपी के अनुसार रिंग बनाते है।

महीनों के अनुसार रोग उपचार एवं प्रबंधन

जुलाई माह के लिए प्रबंधन

इसी समय रोग एवम् कीटों के प्रबन्धन का भी उपाय किया जाना चाहिए। शूट गाल कीट तराई क्षेत्रों में या जहाँ नमी ज्यादा होती है, यह एक विकट समस्या है। इस कीट के नियंत्रण के लिए जुलाई–अगस्त का महीना बहुत महत्वपूर्ण है।

अगस्त माह के लिए प्रबंधन

अगस्त के मध्य में मोनोक्रोटोफॉस /डाइमेथोएट (1मिली लीटर दवा /2 लीटर पानी ) का छिड़काव करें। बाग में मकड़ी के जाले को साफ करना चाहिए और प्रभावित हिस्से को काटकर जला देना चाहिए। अधिक वर्षा एवं नमी ज्यादा होने की वजह से लाल जंग रोग (रेड रुस्ट) और एन्थ्रेक्नोज रोग ज्यादा देखने को मिलता है इसके नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (3ग्राम /लीटर पानी) का छिड़काव करें।

सितंबर माह के लिए प्रबंधन

सितंबर के महीने में मोनोक्रोटोफोस / डाइमेथोएट (1मिली लीटर दवा /2 लीटर पानी ) का दुबारा छिड़काव करें, यदि शूट गाल कीट बनाने वाले कीट पेड़ पर देखा जाता है तो लाल जंग और एन्थ्रेक्नोज के नियंत्रण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (3ग्राम /लीटर पानी) का 2-3 छिड़काव करना चाहिए।

अक्टूबर माह के लिए प्रबंधन

अक्टूबर के महीने के दौरान डाई-बैक रोग के लक्षण अधिक दिखाई देते हैं। इस रोग के प्रबंधन के लिए आवश्यक है की जहा तक टहनी सुख गई है उसके आगे 5-10 सेमी हरे हिस्से तक टहनी की कटाई-छंटाई करके उसी दिन कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (3ग्राम /लीटर पानी) का छिड़काव करें तथा 10-15 दिन के अंतराल पर एक छिड़काव पुनः करें। आम के पेड़ में गमोसिस भी एक बड़ी समस्या है इसके नियंत्रण के लिए सतह को साफ करें और प्रभावित हिस्से पर बोर्डो पेस्ट लगाएं या प्रति पेड़ 200-400 ग्राम कॉपर सल्फेट का पेस्ट मुख्य तने पर लगाएं। गुम्मा व्याधि का संक्रमण होने पर अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में एन ए ए (200 पी पी एम) (2 ग्राम/10 लीटर ) या (90 मि.ली./200 लीटर) का छिड़काव करे।

अक्टूबर-नवंबर माह के लिए प्रबंधन

अक्टूबर - नवंबर महीने के दौरान डाई-बैक लक्षण आम हैं। इसलिए, 5-10 सेंटीमीटर हरे भाग में मृत लकड़ियों की छंटाई की सलाह दी जाती है और आम के पेड़ों को मरने से बचाने के लिए 15 दिनों के अंतराल पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (3ग्राम /लीटर पानी) का दो बार छिड़काव किया जाता है। यदि गमोसिस के लक्षण दिखाई देते हैं, तो सतह को साफ करें और प्रभावित हिस्से पर बोर्डो पेस्ट लगाएं।

दिसंबर माह के लिए प्रबंधन

दिसम्बर माह में बाग की हलकी जुताई करें और बाग से खरपतवार निकाल दें। इस महीने के अंत तक मिली बग के नियंत्रण के लिए आम के पेड़ की बैंडिंग की व्यवस्था करें, 25-30 सेमी की चौड़ाई वाली एक अल्केथेन शीट (400 गेज) को 30-40 सेमी की ऊंचाई पर पेड़ के तने के चारों ओर लपेटा जाना चाहिए। इस शीट को दोनों छोर पर बांधा जाना चाहिए और पेड़ पर चढ़ने के लिए मीली बग कीट को रोकने के लिए निचले सिरे पर ग्रीस लगाया जाना चाहिए। मिली बग कीट के नियंत्रण के लिए बेसिन में कार्बोसल्फान (100 मिली / 100 लीटर पानी) या क्लोरपायरीफॉस ग्रेन्यूल्स (250 ग्राम / पेड़ ) का छिड़काव/बुरकाव करना चाहिए । दिसम्बर माह में छाल खाने वाले और मुख्य तने में छेद (ट्रंक बोरिंग) कीड़ों को नियंत्रित करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पहले छेदों को पहचानें और उस क्षेत्र को साफ करें और इन छेदों में डाइक्लोरवोस या मोनोक्रोटोफॉस (1मिली लीटर दवा /2 लीटर पानी) लगाएं। कीटनाशक डालने के बाद इन छिद्रों को वैक्स या गीली मिट्टी से बंद (प्लग) कर देना चाहिए। दिसम्बर बागों में बागों की हल्की जुताई करनी चाहिए, बागों बहुत हल्का पानी देना चाहिए जिससे मिज कीट, फल मक्खी, गुजिया कीट एव जाले वाले कीट की अवस्थाए नष्ट हो जाएँ। कुछ तो गुड़ाई करते समय ही मर जाती हैं, कुछ परजीवी एव परभक्षी कीड़ों या दूसरे जीवों का शिकार हो जाती हैं और कुछ जमीन से ऊपर आने पर अधिक सर्दी या ताप की वजह से मर जाती है।

जनवरी माह के लिए प्रबंधन

जनवरी माह में कभी कभी बौर जल्दी निकल आते है ,यथासम्भव तोड़ देना चाहिए। इससे गुम्मा रोग का प्रकोप कम हो जाता है। बौर निकलने के समय पुष्प मिज कीट का प्रकोप दिखते ही क्विनालफास (1 मि.ली./लीटर ) या डामेथोएट (1.5 मि.ली./लीटर ) पानी में घोल कर छिड़काव किया जाना चाहिए।

लेखकः
प्रोफेसर (डॉ) एसके सिंह
सह निदेशक अनुसंधान एवं
प्रधान अन्वेषक , अखिल भारतीय फल अनुसन्धान परियोजना
डॉ राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय , पूसा , समस्तीपुर, बिहार
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